संविधान के अनुसार भारत में आदिवासी नहीं रहते हैं

दुनिया के अधिकांश राष्ट्र 9 अगस्त को अपने यहां सरकारी तौर पर ‘आदिवासी दिवस’ का आयोजन करते हैं। आदिवासी दिवस का आयोजन वास्तव में उस अंतरराष्ट्रीय संकल्प का समर्थन है जो आईएलओ और यूएनओ द्वारा लिया गया है। परंतु संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार भारत में आदिवासी नहीं रहते हैं। यहां ‘अनुसूचित जनजाति’ रहते हैं, जिनकी विशिष्ट भाषा-संस्कृति, धार्मिक विश्वास और परंपराएं हैं। गांधी जी ने भी कहा है कि ये सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से अविकसित पिछड़े हुए हिंदू हैं। यही नहीं, भारत सरकार के प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र संघ में भी बार-बार दोहराया है कि, ‘भारत की अनुसूचित जनजातियां संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिभाषित आदिवासी या देशज (इंडीजीनस) लोग नहीं हैं, बल्कि भारत के सभी लोग देशज हैं।’ भारत में कोई आदिवासी नहीं रहता। जाहिर है जब देश का शासन विश्व समुदाय के सामने अपनी भूमि के सबसे पुराने बाशिंदों की उपस्थिति से इनकार करता हो, कोई भी आसानी से समझ सकता है कि स्वातंत्रोतर भारत में आदिवासी अधिकारों की वर्तमान स्थिति कैसी हो सकती है। साथ ही यह भी विचारणीय है कि वह कौन-सा संवैधानिक आधार है जिसके तहत सरकार अपने यहां आदिवासियों के होने से इनकार करती है।

वर्तमान 16वीं लोकसभा में हुई बहस का उल्लेख इस संदर्भ में प्रासंगिक होगा, जो बताता है कि आदिवासियों के प्रति हमारी संसद और सरकार कितनी संवेदनशील है। पिछले साल 9 अगस्त को तेलंगाना राष्ट्र समिति के महबूबाबाद से सांसद ए. सीताराम नाइके ने लोकसभा में पूछा था, ‘संयुक्त राष्ट्र के दिशानिर्देशों के अनुसार यह सरकार राज्य और राष्ट्रीय उत्सव के रूप में आदिवासी दिवस को क्यों नहीं आयोजित कर रही है? विश्वविद्यालयों और जनजातीय कल्याण विभाग को भी आदिवासी दिवस मनाने का आदेश क्यों नहीं दिये जा रहे हैं?’ अलीपुर द्वार, पश्चिम बंगाल के सांसद श्री दशरथ तिर्की ने कहा, ‘सर्वाेच्च न्यायालय ने देश के आदिवासियों को देश का प्रथम निवासी माना है। …मैं सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि आदिवासियों की उन्नति के लिए आप क्या-क्या कदम उठाएंगे?’ वहीं, राजमहल, झारखंड के सांसद विजय कुमार हाँसदाक की राय थी, ‘आदिवासियों का धर्म अलग हो सकता है, पर आदिवासियों की जाति आदिवासी ही होती है। लेकिन, जब जनगणना में उनकी गणना ठीक ढंग से नहीं की गयी है। इसलिए इनका पॉपुलेशन कैलकुलेशन उनकी जाति के आधार पर हो और उसे ठीक ढंग से पेश किया जाए।’ इन सबके जवाब में माननीय अध्यक्ष महोदय ने कहा, ‘बस हो गया। बधाई दे दीजिए और कल्पना कीजिए कि उनकी उन्नति हो जाए।’

दरअसल द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी अधिकारों का सवाल केन्द्र में आ चुका था। प्रायः सभी देश आदिवासी समुदायों के संघर्ष के दबाव में थे। जिसके फलस्वरूप इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (आईएलओ) ने 1957 में आदिवासियों की सुरक्षा के संबंध में एक प्रस्ताव (107) पारित किया। इसके बाद दुनियाभर के आदिवासियों के परंपरागत अधिकारों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1982 में एक कार्यदल ‘वर्किंग ग्रुप ऑन इंडीजीनस पॉपुलेशंस’ का गठन किया। इस दल की पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को हुई और 1985 में इसने आदिवासी अधिकारों का अंतरराष्ट्रीय घोषण-पत्र जारी करने का फैसला लिया। 1989 में आईएलओ ने प्रस्ताव संख्या 169 के द्वारा आदिवासियों की पहचान इस तरह से की: 1. आदिवासी वे लोग हैं जो औपनिवेशिकरण से पहले किसी खास देश या भौगोलिक क्षेत्र के निवासी हैं, 2. औपनिवेशिकरण के बाद जिन्हें बाहरी लोगों ने उनको अपने परंपरागत क्षेत्र से बाहर धकेल दिया और 3. इनकी अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था रही है। 1993 में यूएनडब्लूजीईपी कार्यदल के 11 वें अधिवेशन में आदिवासी अधिकार घोषणा प्रारुप को मान्यता दी गई और 1993 को आदिवासी वर्ष व 9 अगस्त को आदिवासी दिवस घोषित किया गया। आदिवासी अधिकारों को लागू करने और उनके भाषा संस्कृति, इतिहास के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने 9 अगस्त 1994 को जेनेवा में पहला अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस आयोजित किया। इसमें शामिल सभी राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने एकमत से संकल्प लिया कि ‘हम आदिवासियों के साथ हैं’। यह भी स्वीकार किया कि वे सब अपने-अपने देशों में आदिवासियों के सभी हकों को बरकरार रखने के लिए समुचित कदम उठाएंगे। और अंततः संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2007 में ‘आदिवासी अधिकारों का घोषणा-पत्र’ जारी करते हुए कहा कि दुनियाभर में आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि आदिवासियों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। उनके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं की सुरक्षा होनी चाहिए। विशेषकर, जल, जंगल, जमीन और स्थानीय व प्राकृतिक संसाधनों पर उनके परंपरागत अधिकारों को स्वीकार किया जाना चाहिए। घोषणा-पत्र में आदिवासी समुदायों के राजनीतिक आत्म-निर्णय के अधिकारों और उन्हें स्वायत्तता देने की बात पर विशेष बल दिया गया।

लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित ‘आदिवासी अधिकारों का घोषणा-पत्र’ पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, चूंकि भारतीय संविधान में ‘आदिवासी’ नहीं हैं अनुसूचित जनजाति हैं, भारत सरकार ने आज तक आदिवासी अधिकारों के लिए कोई सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए हैं। यहां तक कि संविधान की पांचवी और छठी अनुसूची, जो आदिवासी हितों का निर्देश देते हैं, उनको भी वास्तविक अर्थ में लागू नहीं किया गया है। देश के पहाड़ी और मैदानी दोनों ही तरह के आदिवासी इलाकों में संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना आम राजनीतिक और प्रशासनिक परिघटना है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे बुनियादी नागरिक अधिकारों से आदिवासी वंचित तो हैं ही, विकासीय परियोजनाओं से लगातार बेदखली, पलायन और मानव तस्करी का शिकार बने हुए हैं। भूमि और भाषा-संस्कृति से हर रोज विस्थापित हो रहे हैं। नव-उदारवादी और नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में उनके जीने के बचे-खुचे आर्थिक आधारों को भी सरकारी निवेश नीतियां छीन लेने पर आमादा हैं। आदिवासियों के भूमि संबंधी 1908 में पारित ‘छोटानागपुर टिनेंसी एक्ट’ और ‘संताल परगना टिनेंसी एक्ट’ जैसे कानूनी प्रावधानों को मल्टी नेशनल कॉरपोरेट खनन कंपनियों के हित में बदलने का प्रयास हो रहा है। नक्सलवाद के नाम पर राजकीय हिंसा और दमन तो जैसे आदिवासियों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा हो गया है।

संविधान निर्माण के समय जब डा. अंबेडकर ने संविधान से ‘आदिवासी’ शब्द के विलोपन का प्रस्ताव रखा था तब किसी ने यह कल्पना नहीं की थी कि भविष्य में इसके क्या परिणाम होंगे। लेकिन आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा को इस बात का आभास था इसीलिए उन्होंने डा. अंबेडकर के प्रस्ताव का विरोध करते हुए उनसे स्पष्टीकरण की मांग की थी। 2 दिसंबर 1948 को जयपाल सिंह ने संविधान से ‘आदिवासी’ शब्द हटाए जाने पर पूछा था, ‘प्रस्ताव नंबर 491, जिसमें आदिवासी शब्द को अनुसूचित जनजाति से विस्थापित किये जाने की बात की गई है। मुझे अफसोस होता है कि सदन में बिना ट्राइबल सब कमिटियों की रिपोर्ट और अनुशंसाएं आए ही आदिवासियों के संबंध में फैसले लिए जा रहे हैं। …डॉ. अंबेडकर से मैं जानना चाहूंगा कि जो आदिवासी दोनों शेड्यूल्ड क्षेत्रों से बाहर हैं, नये संविधान में इन आदिवासियों का स्टेटस क्या होगा?’ डा. अंबेडकर का जवाब था, ‘अनुसूचित शब्द का चयन मैंने ‘एबरोजिनिल’ के विकल्प में किया है। …‘आदिबासी’ शब्द एक सामान्य पद है और कोई विधि सम्मत अर्थ नहीं रखता। आदिवासी कौन हैं? यह सवाल निःसंदेह प्रासंगिक है पर इसे परिभाषित करने की जरूरत होगी।’ पांचवीं और छठी अनुसूची से बाहर रहने वाले आदिवासियों का स्टेटस क्या होगा, इस पर उनकी टिप्पणी थी, ‘मैं इस सवाल का जवाब देने में असमर्थ हूं। …फिलहाल दोनों क्षेत्रों से बाहर रह रहे अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक स्थिति को बहाल रख पाना व्यावहारिक रूप से असंभव है।’

error: Content is protected !!